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mahabharat 13.62.5: याचक मर जाता है, परन्तु देनेवाला कभी नहीं मरता। युधिष्ठिर! देनेवाला स्वयं के साथ-साथ याचक को भी जीवित रखता है। ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 13.62: श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 62: श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.62.5 
म्रियते याचमानो वै न जातु म्रियते ददत्।
ददत् संजीवयत्येनमात्मानं च युधिष्ठिर॥ ५॥
 
 
अनुवाद
याचक मर जाता है, परन्तु देनेवाला कभी नहीं मरता। युधिष्ठिर! देनेवाला स्वयं के साथ-साथ याचक को भी जीवित रखता है। ॥5॥
 
The beggar dies, but the giver never dies. Yudhishthira! The giver keeps the beggar alive as well as himself. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)