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mahabharat 13.62.19-20: इस प्रकार आपकी भक्ति से पवित्र एवं दक्षिणायुक्त यज्ञ का विस्तार हो रहा है; यह समस्त यज्ञों से महान है। पितामह युधिष्ठिर! आपका यह यज्ञ सदैव चलता रहे। 19-20॥   |   mahabharat अध्याय 13.62: श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 62: श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  13.62.19-20 
एष ते विततो यज्ञ: श्रद्धापूत: सदक्षिण:॥ १९॥
विशिष्ट: सर्वयज्ञानां नित्यं तात प्रवर्तताम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार आपकी भक्ति से पवित्र एवं दक्षिणायुक्त यज्ञ का विस्तार हो रहा है; यह समस्त यज्ञों से महान है। पितामह युधिष्ठिर! आपका यह यज्ञ सदैव चलता रहे। 19-20॥
 
In this way, the sacred and Dakshina-filled Yagya is expanding with your devotion; This is greater than all yagyas. Father Yudhishthir! This yagya of yours should always continue. 19-20॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षष्टितमोऽध्याय:॥ ६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)