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mahabharat 13.62.15-16h: हे पिता! यदि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला ब्राह्मण प्रातःकाल घर पर भोजन करता है, तो वह तीनों अग्नियों को तृप्त कर देता है।   |   mahabharat अध्याय 13.62: श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 62: श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान‍्को दान देनेका विशेष फल  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  13.62.15-16h 
अन्नानि प्रात:सवने नियता ब्रह्मचारिण:॥ १५॥
ब्राह्मणास्तात भुञ्जानास्त्रेताग्निं प्रीणयन्त्युत।
 
 
अनुवाद
हे पिता! यदि ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला ब्राह्मण प्रातःकाल घर पर भोजन करता है, तो वह तीनों अग्नियों को तृप्त कर देता है।
 
O father! If a Brahmin who strictly observes the vow of celibacy eats his meal at home in the morning, he satisfies all the three fires.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)