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mahabharat 13.61.7: इस संसार में जो भी वस्तु सबसे अधिक मूल्यवान समझी जाती है और जो भी वस्तु अपने घर में प्रिय है, वही वस्तु किसी पुण्यात्मा को देनी चाहिए। जो व्यक्ति अपने दान को चिरस्थायी बनाना चाहता है, उसे ऐसा करना आवश्यक है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 13.61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.61.7 
यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे।
तत् तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥ ७॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में जो भी वस्तु सबसे अधिक मूल्यवान समझी जाती है और जो भी वस्तु अपने घर में प्रिय है, वही वस्तु किसी पुण्यात्मा को देनी चाहिए। जो व्यक्ति अपने दान को चिरस्थायी बनाना चाहता है, उसे ऐसा करना आवश्यक है ॥7॥
 
Whatever is considered to be the most precious thing in this world and whatever is dear to one in one's own home, the same thing should be given to a virtuous person. It is necessary for one who wants to make his charity everlasting to do so. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)