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mahabharat 13.61.34-35h: ब्राह्मण स्वभावतः सज्जन, सत्यवादी और सच्चे धर्म का पालन करने वाले होते हैं, किन्तु जब वे क्रोधित होते हैं तो विषैले सर्प के समान भयंकर हो जाते हैं। इसलिए तुम्हें सदैव ब्राह्मणों की सेवा करनी चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  13.61.34-35h 
मृदुभावान् सत्यशीलान् सत्यधर्मानुपालकान्॥ ३४॥
आशीविषानिव क्रुद्धांस्तानुपाचरत द्विजान्।
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण स्वभावतः सज्जन, सत्यवादी और सच्चे धर्म का पालन करने वाले होते हैं, किन्तु जब वे क्रोधित होते हैं तो विषैले सर्प के समान भयंकर हो जाते हैं। इसलिए तुम्हें सदैव ब्राह्मणों की सेवा करनी चाहिए।
 
Brahmins are naturally gentle, truthful and followers of true religion, but when they are angry they become as dangerous as a poisonous snake. Therefore you should always serve the Brahmins. 34 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)