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mahabharat 13.61.32-33h: महाराज! अब मैं आपको सनातन काल की धार्मिक प्रथाओं के बारे में बताता हूँ। हमने सुना है कि पूर्वकाल में क्षत्रिय ब्राह्मणों की, वैश्य क्षत्रियों की और शूद्र वैश्यों की सेवा करते थे।   |   mahabharat अध्याय 13.61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.61.32-33h 
अत्र ते वर्तयिष्यामि यथा धर्मं सनातनम्।
राजन्यो ब्राह्मणान् राजन् पुरा परिचचार ह॥ ३२॥
वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुति:।
 
 
अनुवाद
महाराज! अब मैं आपको सनातन काल की धार्मिक प्रथाओं के बारे में बताता हूँ। हमने सुना है कि पूर्वकाल में क्षत्रिय ब्राह्मणों की, वैश्य क्षत्रियों की और शूद्र वैश्यों की सेवा करते थे।
 
King! Now I will tell you about the religious practices of the Sanatan times. We have heard that in the past, Kshatriyas used to serve Brahmins, Vaishyas used to serve Kshatriyas and Shudras used to serve Vaishyas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)