| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 61: भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश » श्लोक 3-4 |
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| | | | श्लोक 13.61.3-4  | भीष्म उवाच
अभयं सर्वभूतेभ्यो व्यसने चाप्यनुग्रह:।
यच्चाभिलषितं दद्यात् तृषितायाभियाचते॥ ३॥
दत्तं मन्येत यद् दत्त्वा तद् दानं श्रेष्ठमुच्यते।
दत्तं दातारमन्वेति यद् दानं भरतर्षभ॥ ४॥ | | | | | | अनुवाद | | भीष्म ने कहा- युधिष्ठिर! समस्त प्राणियों को अभयदान देना, संकट के समय उन पर दया करना, याचक को इच्छित वस्तु देना और प्यासे को जल पिलाना उत्तम दान है और जो दान देने के बाद दिया हुआ ही माना जाता है, अर्थात् जिसमें आसक्ति का कहीं लेश भी नहीं है, उसे उत्तम दान कहते हैं। हे भरतश्रेष्ठ! वह दान दाता के पीछे-पीछे चलता है। | | | | Bhishma said- Yudhishthira! Giving protection to all creatures, showing mercy to them in times of crisis, giving the desired object to a beggar and giving water to a thirsty person is the best charity and the charity which is considered as given after giving, that is, in which there is no trace of attachment anywhere, is called the best charity. O best of Bharatas! That charity follows the donor. | | ✨ ai-generated | | |
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