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श्लोक 13.61.22  |
य एवं नैव कुप्यन्ते न लुभ्यन्ति तृणेष्वपि।
त एव न: पूज्यतमा ये चापि प्रियवादिन:॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| जो ब्राह्मण कभी क्रोध नहीं करते, जिनके हृदय में किंचितमात्र भी लोभ नहीं है और जो मधुर वचन बोलते हैं, वे हमारे लिए परम पूजनीय हैं ॥ 22॥ |
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| Those brahmins who never become angry, who do not have even the slightest greed in their hearts and who speak sweet words, are the most revered by us. ॥ 22॥ |
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