श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 59: विविध प्रकारके तप और दानोंका फल  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  13.59.4 
वयं हि तान् कुरून् हत्वा ज्ञातींश्च सुहृदोऽपि वा।
अवाक्शीर्षा: पतिष्यामो नरके नात्र संशय:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं है कि हम अपने ही कुटुम्बियों, कौरवों तथा अन्य मित्रों को मारकर मुँह के बल नरक में गिरेंगे ॥4॥
 
There is no doubt that after killing our own relatives, Kauravas and other friends, we shall fall face down into hell. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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