श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 58: च्यवन ऋषिका भृगुवंशी और कुशिकवंशियोंके सम्बन्धका कारण बताकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  13.58.8-9 
क्षत्रियाणामभावाय दैवयुक्तेन हेतुना।
स तु तं प्रतिगृह्यैव पुत्रे संक्रामयिष्यति॥ ८॥
जमदग्नौ महाभागे तपसा भावितात्मनि।
स चापि भृगुशार्दूलस्तं वेदं धारयिष्यति॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वह ईश्वरीय कृपा से क्षत्रियों का संहार करने के लिए धनुर्वेद प्राप्त करेगा और उसे अपने पुत्र, महाबली जमदग्नि को सिखाएगा, जिनका हृदय तपस्या से शुद्ध है। भृगुश्रेष्ठ जमदग्नि धनुर्वेद को धारण करेंगे। 8-9.
 
He will, by divine grace, receive the Dhanurveda in order to kill the Kshatriyas and teach it to his son, the great Jamadagni, whose heart is purified by penance. The best of Bhrigu, Jamadagni, will hold the Dhanurveda. 8-9.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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