श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 58: च्यवन ऋषिका भृगुवंशी और कुशिकवंशियोंके सम्बन्धका कारण बताकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  13.58.2-3 
भृगूणां क्षत्रिया याज्या नित्यमेतज्जनाधिप।
ते च भेदं गमिष्यन्ति दैवयुक्तेन हेतुना॥ २॥
क्षत्रियाश्च भृगून् सर्वान् वधिष्यन्ति नराधिप।
आ गर्भादनुकृन्तन्तो दैवदण्डनिपीडिता:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! क्षत्रिय सदैव से भृगु वंश के ब्राह्मणों के संरक्षक रहे हैं; किन्तु प्रारब्धवश भविष्य में उनमें फूट पड़ जाएगी। अतः वे ईश्वर की प्रेरणा से समस्त भृगु वंश का संहार करेंगे। हे राजन! ईश्वरीय दण्ड से पीड़ित होकर वे गर्भस्थ शिशु को भी मार डालेंगे।
 
O king! The Kshatriyas have always been the patrons of the Brahmins of the Bhrigu lineage; but due to destiny, there will be divisions among them in the future. Therefore, with the inspiration of the divine, they will kill all the Bhrigu lineage. O king! Being afflicted by the divine punishment, they will kill even the unborn child.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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