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mahabharat 13.56.41-42: भृगु नंदन! यह मेरे राज्य का फल है और मेरी तपस्या का भी फल है। ब्राह्मण! यदि आप मुझसे प्रेम करते हैं तो मेरे मन में एक शंका है, कृपया उसका समाधान करें।   |   mahabharat अध्याय 13.56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 41-42
 
 
श्लोक  13.56.41-42 
एतद् राज्यफलं चैव तपसश्च फलं मम।
यदि त्वं प्रीतिमान् विप्र मयि वै भृगुनन्दन॥ ४१॥
अस्ति मे संशय: कश्चित् तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
भृगु नंदन! यह मेरे राज्य का फल है और मेरी तपस्या का भी फल है। ब्राह्मण! यदि आप मुझसे प्रेम करते हैं तो मेरे मन में एक शंका है, कृपया उसका समाधान करें।
 
Bhrigu Nandan! This is the result of my kingdom and also the result of my penance. Brahmin! If you love me then I have a doubt in my mind, please solve it.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनकुशिकसंवादे चतु:पञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवन और कुशिकका संवादविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)