श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  13.56.40 
यत् प्रीतोऽसि मया ब्रह्मन् कुलं त्रातं च मेऽनघ।
एष मेऽनुग्रहो विप्र जीविते च प्रयोजनम्॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
हे निष्पाप ब्रह्मर्षि! आप प्रसन्न हुए और आपने मेरे कुल को नाश से बचा लिया, यह आपका मुझ पर महान उपकार है। और इसी से मेरे जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य पूरा हो गया ॥40॥
 
Sinless Brahmarshi! You are pleased and you have saved my family from destruction, this is your great favour on me. And with this the whole purpose of my life has been accomplished. ॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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