श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  13.56.31 
ब्राह्मण्यस्य प्रभावाद्धि रथे युक्तौ स्वधुर्यवत्।
इत्येवं चिन्तयान: स विदितश्च्यवनस्य वै॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
हमारे ब्राह्मणत्व के प्रभाव से ही ऋषि ने हम दोनों को अपने वाहन के समान अपने रथ में जोत लिया था।’ राजा ऐसा विचार कर ही रहा था कि च्यवन ऋषि को उसके आगमन का पता चल गया॥31॥
 
It was because of the influence of our brahminhood that the sage had harnessed us both to his chariot like his own vehicles.' The king was thinking in this manner when the sage Cyavana came to know of his arrival.॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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