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mahabharat 13.56.3-4: भारत! उस समय राजा कुशिक ने शिल्पियों की इच्छानुसार बनी हुई अनेक दिव्य वस्तुएँ देखीं। कहीं चाँदी के शिखरों से सुशोभित पर्वत थे, कहीं कमलों से भरे सरोवर थे, कहीं नाना प्रकार की कला-दीर्घाएँ और मेहराबें थीं। कहीं भूमि पर सोने से मढ़ा हुआ ठोस फर्श था और कहीं हरी घास का झरना था।   |   mahabharat अध्याय 13.56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 3-4
 
 
श्लोक  13.56.3-4 
तत्र दिव्यानभिप्रायान् ददर्श कुशिकस्तदा।
पर्वतान् रूप्यसानूंश्च नलिनीश्च सपङ्कजा:॥ ३॥
चित्रशालाश्च विविधास्तोरणानि च भारत।
शाद्वलोपचितां भूमिं तथा काञ्चनकुट्टिमाम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
भारत! उस समय राजा कुशिक ने शिल्पियों की इच्छानुसार बनी हुई अनेक दिव्य वस्तुएँ देखीं। कहीं चाँदी के शिखरों से सुशोभित पर्वत थे, कहीं कमलों से भरे सरोवर थे, कहीं नाना प्रकार की कला-दीर्घाएँ और मेहराबें थीं। कहीं भूमि पर सोने से मढ़ा हुआ ठोस फर्श था और कहीं हरी घास का झरना था।
 
Bharat! At that time King Kushik saw many other divine things made as per the intentions of the craftsmen. Somewhere there were mountains decorated with silver peaks, somewhere there were lakes filled with lotuses, somewhere there were various art galleries and arches. Somewhere on the ground there was a solid floor covered with gold and somewhere there was a spring of green grass.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)