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mahabharat 13.56.27: ‘जिसकी केवल मन से कल्पना की जा सकती है, वह तप से प्रत्यक्ष प्राप्त हो सकता है। तप तीनों लोकों के राज्य से भी श्रेष्ठ है।॥27॥   |   mahabharat अध्याय 13.56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  13.56.27 
तपसा तदवाप्यं हि यत् तु शक्यं मनोरथै:।
त्रैलोक्यराज्यादपि हि तप एव विशिष्यते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
‘जिसकी केवल मन से कल्पना की जा सकती है, वह तप से प्रत्यक्ष प्राप्त हो सकता है। तप तीनों लोकों के राज्य से भी श्रेष्ठ है।॥27॥
 
‘That which can only be imagined by the mind, can be directly attained by penance. Penance is better than the kingdom of the three worlds.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)