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श्लोक 13.56.16  |
तं दृष्ट्वात्यद्भुतं राजा मनसाचिन्तयत् तदा।
स्वप्नोऽयं चित्तविभ्रंश उताहो सत्यमेव तु॥ १६॥ |
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| अनुवाद |
| उस अत्यन्त आश्चर्यमय दृश्य को देखकर राजा मन ही मन सोचने लगा - 'हाय! क्या यह स्वप्न है, या मेरे मन का भ्रम है, या यह सब सत्य है?॥16॥ |
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| Seeing that most astonishing sight the king began to think to himself, 'Oh! Is this a dream, or is this an illusion in my mind, or is all this true?॥ 16॥ |
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