Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.56.13-14: पृथ्वीनाथ! कहीं अप्सराओं के समूह विचरण कर रहे थे। कहीं गन्धर्वों के समूह अपनी-अपनी प्रेमिकाओं के आलिंगन में लीन थे। राजा उन सबको देख रहे थे। कभी उन्हें देख पाते थे, कभी नहीं देख पाते थे॥13-14॥ | mahabharat अध्याय 13.56: महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
क्वचिदप्सरसां संघान् गन्धर्वाणां च पार्थिव॥ १३॥
कान्ताभिरपरांस्तत्र परिष्वक्तान् ददर्श ह।
न ददर्श च तान् भूयो ददर्श च पुनर्नृप:॥ १४॥
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! कहीं अप्सराओं के समूह विचरण कर रहे थे। कहीं गन्धर्वों के समूह अपनी-अपनी प्रेमिकाओं के आलिंगन में लीन थे। राजा उन सबको देख रहे थे। कभी उन्हें देख पाते थे, कभी नहीं देख पाते थे॥13-14॥
Prithvinath! Somewhere groups of Apsaras were roaming around. Somewhere groups of Gandharvas were locked in the embrace of their beloveds. The king saw them all. Sometimes he could see them and sometimes he could not.॥ 13-14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥