श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  13.55.56 
रमणीय: समुद्देशो गंगातीरमिदं शुभम्।
किंचित्कालं व्रतपरो निवत्स्यामीह पार्थिव॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वी के स्वामी! यह गंगा का तट अत्यंत रमणीय है। मैं व्रत रखूँगा और कुछ समय तक यहीं रहूँगा।॥56॥
 
Lord of the Earth! This beautiful bank of the Ganges is a very beautiful place. I will observe fasts and stay here for some time. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)