श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 55: च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  13.55.54-55 
अथाब्रवीन्नृपो वाक्यं श्रमो नास्त्यावयोरिह।
विश्रान्तौ च प्रभावात् ते ऊचतुस्तौ तु भार्गवम्॥ ५४॥
अथ तौ भगवान‍् प्राह प्रहृष्टश्च्यवनस्तदा।
न वृथा व्याहृतं पूर्वं यन्मया तद् भविष्यति॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
उस समय राजा ने भृगुपुत्र च्यवन से कहा - ‘अब हम दोनों को यहाँ जरा भी थकान नहीं हो रही है। आपके प्रभाव से हम दोनों को पूर्ण विश्राम और सुख का अनुभव होने लगा है।’ जब उन दोनों ने ऐसा कहा, तब भगवान च्यवन पुनः प्रसन्न हुए और बोले - ‘मैंने पहले जो कुछ कहा है, वह व्यर्थ नहीं जाएगा, वह अवश्य पूरा होगा। ॥ 54-55॥
 
At that time the king said to Bhrigu's son Chyavana - 'Now both of us are not feeling tired here at all. Both of us have started feeling complete rest and happiness due to your influence.' When both of them said this, then Lord Chyavana again became happy and said - 'Whatever I have said earlier will not go in vain, it will definitely be fulfilled. ॥ 54-55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)