श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 53: राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्‍गति  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक  13.53.47-48 
एतत्ते कथितं तात यन्मां त्वं परिपृच्छसि।
दर्शने यादृश: स्नेह: संवासे वा युधिष्ठिर॥ ४७॥
महाभाग्यं गवां चैव तथा धर्मविनिश्चयम्।
किं भूय: कथ्यतां वीर किं ते हृदि विवक्षितम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
हे युधिष्ठिर! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार मैंने यह सम्पूर्ण वृत्तांत कह सुनाया है। गौओं के दर्शन और उनके साथ रहने से किस प्रकार का स्नेह उत्पन्न होता है? गौओं का क्या महत्व है? तथा इस विषय में धर्म का क्या निश्चय है? ये सब बातें इस वृत्तांत से स्पष्ट हो जाती हैं। अब मैं तुमसे क्या कहूँ? हे वीर! तुम क्या सुनना चाहते हो?॥47-48॥
 
Dear Yudhishthira, I have narrated this entire episode as per your question. What kind of affection is generated by seeing and being in the company of cows? What is the significance of cows? And what is the determination of Dharma in this matter? All these things become clear from this episode. Now what should I tell you? Brave one! What do you wish to hear?॥47-48॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि च्यवनोपाख्याने एकपञ्चाशत्तमोऽध्याय:॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें च्यवनका उपाख्यानविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५१॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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