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श्लोक 13.53.36  |
हवींषि सर्वाणि यथा ह्युपभुङ्क्ते हुताशन:।
एवं त्वमपि धर्मात्मन् पुरुषाग्नि: प्रतापवान्॥ ३६॥ |
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| अनुवाद |
| हे पुण्यात्मा! जैसे अग्निदेव सम्पूर्ण हविओं को भस्म कर देते हैं, वैसे ही आप भी हमारे दोषों और दुर्गुणों को भस्म करने वाली तेजस्वी अग्निस्वरूप हैं ॥ 36॥ |
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| O virtuous one! Just as the fire-god absorbs all the offerings, in the same way you too are in the form of a majestic fire that burns away our faults and bad habits. ॥ 36॥ |
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