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श्लोक 13.53.30  |
अमृतं ह्यव्ययं दिव्यं क्षरन्ति च वहन्ति च।
अमृतायतनं चैता: सर्वलोकनमस्कृता:॥ ३०॥ |
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| अनुवाद |
| वह दिव्य अमृत को बिना किसी अशुद्धि के धारण करती है और दुहने पर अमृत ही देती है। वह अमृत का आधार है। सारा जगत उसके आगे नतमस्तक है॥30॥ |
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| She holds the divine nectar without any impurities and gives only nectar when milked. She is the foundation of nectar. The whole world bows down before her.॥ 30॥ |
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