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mahabharat 13.53.2: शुद्ध भाव से, हाथ जोड़कर तथा एकाग्र मन से उसने महात्मा च्यवन को न्यायपूर्वक अपना परिचय दिया॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 13.53: राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्‍गति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 53: राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्‍गति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  13.53.2 
शौचं कृत्वा यथान्यायं प्राञ्जलि: प्रयतो नृप:।
आत्मानमाचचक्षे च च्यवनाय महात्मने॥ २॥
 
 
अनुवाद
शुद्ध भाव से, हाथ जोड़कर तथा एकाग्र मन से उसने महात्मा च्यवन को न्यायपूर्वक अपना परिचय दिया॥ 2॥
 
With pure feelings, with folded hands and with his mind focused, he introduced himself to Mahatma Cyavana in a just manner.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)