|
| |
| |
श्लोक 13.53.16-17  |
तोषयिष्याम्यहं क्षिप्रं यथा तुष्टो भविष्यति॥ १६॥
नाहं मिथ्यावचो ब्रूयां स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।
भवतो यदहं ब्रूयां तत्कार्यमविशंकया॥ १७॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| राजन्! मैं जानता हूँ कि ये मुनि किस प्रकार संतुष्ट होंगे। मैं इन्हें शीघ्र ही संतुष्ट कर दूँगा। मैंने कभी हँसी में भी झूठ नहीं बोला; फिर ऐसे समय में झूठ कैसे बोल सकता हूँ? मैं जो कुछ कहूँ, उसे तुम निःसंदेह करके करो।'॥16-17॥ |
| |
| ‘King! I know how this sage will be satisfied. I will satisfy him soon. I have never told a lie even in jest; then how can I tell a lie at such a time? Whatever I tell you, you should do it without any doubt.'॥ 16-17॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|