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mahabharat 13.52.9: भरतश्रेष्ठ! वे मुनि कभी जल में लकड़ी की तरह सोते और कभी जल के ऊपर खड़े रहते॥9॥   |   mahabharat अध्याय 13.52: गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 52: गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.52.9 
अन्तर्जलेषु सुष्वाप काष्ठभूतो महामुनि:।
ततश्चोर्ध्वस्थितो धीमानभवद् भरतर्षभ॥ ९॥
 
 
अनुवाद
भरतश्रेष्ठ! वे मुनि कभी जल में लकड़ी की तरह सोते और कभी जल के ऊपर खड़े रहते॥9॥
 
Bharatshrestha! That wise sage would sometimes sleep like a stick in the water and sometimes stand above it. 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)