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mahabharat 13.52.7: गंगा-यमुना का वेग बड़ा भयानक था। वे भयंकर गर्जना कर रही थीं। वह वेग वायु के वेग के समान असहनीय था, फिर भी ऋषिगण उसके प्रहार को अपने सिरों पर सहने लगे।   |   mahabharat अध्याय 13.52: गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 52: गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.52.7 
गंगायमुनयोर्वेगं सुभीमं भीमनि:स्वनम्।
प्रतिजग्राह शिरसा वातवेगसमं जवे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
गंगा-यमुना का वेग बड़ा भयानक था। वे भयंकर गर्जना कर रही थीं। वह वेग वायु के वेग के समान असहनीय था, फिर भी ऋषिगण उसके प्रहार को अपने सिरों पर सहने लगे।
 
The speed of the Ganga-Yamuna was very terrifying. It was roaring terribly. That speed was unbearable like the speed of the wind, yet the sages started bearing its blow on their heads. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)