श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  13.50.6 
सर्वानुपायानथ सम्प्रधार्य
समुद्धरेत् स्वस्य कुलस्य तन्त्रम्।
ज्येष्ठो यवीयानपि यो द्विजस्य
शुश्रूषया दानपरायण: स्यात्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
शूद्रपुत्र को अपनी कुल-परम्परा को उन्नत करने के लिए सभी उपायों पर विचार करना चाहिए। आयु में सबसे बड़ा होने पर भी वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य से हीन माना जाता है। अतः उसे तीनों वर्णों की सेवा करनी चाहिए और दानशील होना चाहिए॥6॥
 
A son of a Shudra should think about all the ways to uplift his family tradition. Even though he is the eldest in age, he is considered to be inferior to a Brahmin, Kshatriya and Vaishya. Therefore, he should serve the three castes and be charitable.॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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