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mahabharat 13.50.5: शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न ब्राह्मण का पुत्र, शव अर्थात् शूद्र से श्रेष्ठ कहा गया है; इसीलिए ऋषिगण उसे पराशव कहते हैं। उसे अपने कुल की सेवा करनी चाहिए और अपने सेवा-आचरण का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। 5॥   |   mahabharat अध्याय 13.50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.50.5 
परं शवाद् ब्राह्मणस्यैव पुत्र:
शूद्रापुत्रं पारशवं तमाहु:।
शुश्रूषक: स्वस्य कुलस्य स स्यात्
स्वचारित्रं नित्यमथो न जह्यात्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न ब्राह्मण का पुत्र, शव अर्थात् शूद्र से श्रेष्ठ कहा गया है; इसीलिए ऋषिगण उसे पराशव कहते हैं। उसे अपने कुल की सेवा करनी चाहिए और अपने सेवा-आचरण का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। 5॥
 
The son of a Brahmin, born from the womb of a Shudra, is said to be superior to a Shava, that is, a Shudra; That is why the sages call him Parashav. He should serve his clan and should never abandon his conduct of service. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)