श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  13.50.44 
कुले स्रोतसि संच्छन्ने यस्य स्याद् योनिसंकर:।
संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमथवा बहु॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि वंश और वीर्य गुप्त रहते हैं, अर्थात् कौन किस कुल में और किसके वीर्य से उत्पन्न हुआ है, यह बात ऊपर से प्रकट नहीं होती, तथापि संकर गर्भ से उत्पन्न हुआ मनुष्य कुछ सीमा तक अपने पिता के स्वभाव का आश्रय ले लेता है ॥ 44॥
 
Though the lineage and semen remain secret, i.e. who is born in which family and from whose semen is not revealed superficially, yet a person who is born from a hybrid womb, takes shelter of his father's nature to some extent. ॥ 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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