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mahabharat 13.50.43: जैसे बाघ अपनी भिन्न-भिन्न त्वचा और रूप से अपने माता-पिता के समान होता है, वैसे ही मनुष्य भी अपनी जाति के स्वभाव का अनुसरण करता है ॥43॥   |   mahabharat अध्याय 13.50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  13.50.43 
यथैव सदृशो रूपे मातापित्रोर्हि जायते।
व्याघ्रश्चित्रैस्तथा योनिं पुरुष: स्वां नियच्छति॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
जैसे बाघ अपनी भिन्न-भिन्न त्वचा और रूप से अपने माता-पिता के समान होता है, वैसे ही मनुष्य भी अपनी जाति के स्वभाव का अनुसरण करता है ॥43॥
 
Just as a tiger resembles its parents in its varied skin and appearance, a human being also follows the nature of his species. ॥43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)