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श्लोक 13.50.43  |
यथैव सदृशो रूपे मातापित्रोर्हि जायते।
व्याघ्रश्चित्रैस्तथा योनिं पुरुष: स्वां नियच्छति॥ ४३॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे बाघ अपनी भिन्न-भिन्न त्वचा और रूप से अपने माता-पिता के समान होता है, वैसे ही मनुष्य भी अपनी जाति के स्वभाव का अनुसरण करता है ॥43॥ |
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| Just as a tiger resembles its parents in its varied skin and appearance, a human being also follows the nature of his species. ॥43॥ |
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