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mahabharat 13.50.42: वर्णसंकर मनुष्य अपने पिता या माता अथवा दोनों के स्वभाव का अनुसरण करता है। वह अपने स्वभाव को किसी भी प्रकार छिपा नहीं सकता ॥42॥   |   mahabharat अध्याय 13.50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 50: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  13.50.42 
पित्र्यं वा भजते शीलं मातृजं वा तथोभयम्।
न कथंचन संकीर्ण: प्रकृतिं स्वां नियच्छति॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
वर्णसंकर मनुष्य अपने पिता या माता अथवा दोनों के स्वभाव का अनुसरण करता है। वह अपने स्वभाव को किसी भी प्रकार छिपा नहीं सकता ॥42॥
 
A man of mixed caste follows the nature of his father or mother or both. He cannot hide his nature in any way. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)