श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 5: स्वामिभक्त एवं दयालु पुरुषकी श्रेष्ठता बतानेके लिये इन्द्र और तोतेके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.5.17 
निष्पत्रमफलं शुष्कमशरण्यं पतत्रिणाम्।
किमर्थं सेवसे वृक्षं यदा महदिदं वनम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
शुक! इस वृक्ष के पत्ते झड़ गए हैं, फल नहीं बचे हैं। सूख जाने के कारण यह पक्षियों के घोंसलों के योग्य भी नहीं रहा। जब चारों ओर विशाल वन फैला हुआ है, तब तुम इस ठूंठ का उपयोग क्यों करते हो?॥17॥
 
Shukha! The leaves of this tree have fallen, there are no fruits left. Due to drying up, it is no longer suitable for birds to nest. When there is a huge forest lying around, why do you use this stump of a tree?॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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