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mahabharat 13.5.15: यह सुनकर सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र ने मन ही मन कहा - ‘वाह! वाह! कैसी अद्भुत विद्या है!’ ऐसा कहकर उन्होंने मन ही मन उसका आदर किया॥15॥   |   mahabharat अध्याय 13.5: स्वामिभक्त एवं दयालु पुरुषकी श्रेष्ठता बतानेके लिये इन्द्र और तोतेके संवादका उल्लेख   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.5.15 
ततो दशशताक्षेण साधु साध्विति भाषितम्।
अहो विज्ञानमित्येवं मनसा पूजितस्तत:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र ने मन ही मन कहा - ‘वाह! वाह! कैसी अद्भुत विद्या है!’ ऐसा कहकर उन्होंने मन ही मन उसका आदर किया॥15॥
 
Hearing this, the thousand-eyed Indra said to himself, 'Wow! Wow! What a wonderful science!' Saying so, he respected it in his mind.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)