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श्लोक 13.49.40-41  |
श्रीश्च राज्यं च कोशश्च क्षत्रियाणां युधिष्ठिर॥ ४०॥
विहितं दृश्यते राजन् सागरान्तां च मेदिनीम्।
क्षत्रियो हि स्वधर्मेण श्रियं प्राप्नोति भूयसीम्।
राजा दण्डधरो राजन् रक्षा नान्यत्र क्षत्रियात् ॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| राजा युधिष्ठिर! लक्ष्मी, राज्य और कोष - ये सब शास्त्रों में क्षत्रियों के लिए ही विहित देखे गए हैं। हे राजन! क्षत्रिय अपने धर्म के अनुसार समुद्र पर्यन्त पृथ्वी और बहुत-सी सम्पत्ति प्राप्त करता है। हे मनुष्यों के स्वामी! राजा (क्षत्रिय) दण्ड धारण करने वाला होता है। रक्षा का कार्य क्षत्रिय के अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता। 40-41। |
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| King Yudhishthira! Lakshmi, kingdom and treasury - all these are seen to be prescribed for Kshatriyas only in the scriptures. O King! According to his Dharma, a Kshatriya acquires the earth up to the sea and a lot of wealth. O Lord of men! The king (Kshatriya) is the one who holds a stick. The task of protection cannot be done by anyone except a Kshatriya. 40-41. |
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