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mahabharat 13.47.23: मनुष्य को भी नहीं बेचना चाहिए; अपने ही बच्चों को बेचने से क्या लाभ? पापकर्मों का मूल धन लेकर किया गया कोई भी धार्मिक कार्य सफल नहीं होता। 23.   |   mahabharat अध्याय 13.47: कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 47: कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  13.47.23 
अन्योऽप्यथ न विक्रेयो मनुष्य: किं पुन: प्रजा:।
अधर्ममूलैर्हि धनैस्तैर्न धर्मोऽथ कश्चन॥ २३॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को भी नहीं बेचना चाहिए; अपने ही बच्चों को बेचने से क्या लाभ? पापकर्मों का मूल धन लेकर किया गया कोई भी धार्मिक कार्य सफल नहीं होता। 23.
 
One should not sell even another human being; what is the point of selling one's own children? Any religious deed done with money that is the source of sinful actions is not successful. 23.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे यमगाथा नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मसम्बन्धी यम गाथा नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)