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mahabharat 13.47.14: अन्यत्र यदि पहले पुत्री उत्पन्न हो और उसे पुत्र मान लिया जाए, और फिर पुत्र उत्पन्न हो जाए, तो वह पुत्र पुत्री के साथ पिता के धन का अधिकारी होता है। यदि दूसरे का पुत्र गोद लिया जाए, तो अपनी पुत्री दत्तक पुत्र से श्रेष्ठ मानी जाती है (अतः वह पैतृक धन में अधिक भाग की अधिकारी होती है)।॥14॥   |   mahabharat अध्याय 13.47: कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 47: कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  13.47.14 
अन्यत्र जामया सार्धं प्रजानां पुत्र ईहते।
दुहितान्यत्र जातेन पुत्रेणापि विशिष्यते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अन्यत्र यदि पहले पुत्री उत्पन्न हो और उसे पुत्र मान लिया जाए, और फिर पुत्र उत्पन्न हो जाए, तो वह पुत्र पुत्री के साथ पिता के धन का अधिकारी होता है। यदि दूसरे का पुत्र गोद लिया जाए, तो अपनी पुत्री दत्तक पुत्र से श्रेष्ठ मानी जाती है (अतः वह पैतृक धन में अधिक भाग की अधिकारी होती है)।॥14॥
 
Elsewhere, if a daughter is born first and she is accepted as a son and then a son is born, then that son is entitled to the father's wealth along with the daughter. If someone else's son is adopted, then one's own daughter is considered superior to the adopted son (hence she is entitled to a greater share of the ancestral wealth).॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)