श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 46: कन्या-विवाहके सम्बन्धमें पात्रविषयक विभिन्न विचार  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.46.21 
भीष्म उवाच
यत् किंचित् कर्म मानुष्यं संस्थानाय प्रदृश्यते।
मन्त्रवन्मन्त्रितं तस्य मृषावादस्तु पातक:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी बोले- भारत! मानव-कल्याण से संबंधित कोई भी कार्य मर्यादा के लिए ही किया जाता है। जब सभी विचारशील लोग मिलकर यह निश्चय कर लेते हैं कि 'अमुक कन्या अमुक पुरुष को दी जाए', तो यही मर्यादा विवाह का निश्चय कर देती है। जो झूठ बोलकर इस मर्यादा को उलट देता है, वह पाप का भागी होता है।
 
Bhishmaji said- Bharat! Any work related to the welfare of human beings is done for the sake of order. When all the thoughtful people come together and decide that 'a certain girl should be given to a certain man', then this order itself decides the marriage. The one who reverses this order by telling a lie, is a part of sin.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)