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mahabharat 13.45.d1: जो लोग मानसिक दोषों से मुक्त हैं, वे पाप नहीं करते। यही बात आपके लिए भी सत्य है। मनुष्य अपनी प्रिय पत्नी को अधिक भक्ति से गले लगाता है और मनुष्य अपनी पुत्री को अधिक भक्ति से गले लगाता है; अर्थात् मातृ-स्नेह से उसे गले लगाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.45: देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 45: देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  13.45.d1 
(मनोदोषविहीनानां न दोष: स्यात् तथा तव।
अन्यथाऽऽलिङ्गॺते कान्ता स्नेहेन दुहितान्यथा॥
 
 
अनुवाद
जो लोग मानसिक दोषों से मुक्त हैं, वे पाप नहीं करते। यही बात आपके लिए भी सत्य है। मनुष्य अपनी प्रिय पत्नी को अधिक भक्ति से गले लगाता है और मनुष्य अपनी पुत्री को अधिक भक्ति से गले लगाता है; अर्थात् मातृ-स्नेह से उसे गले लगाता है।
 
Those who are free from mental defects do not commit sins. The same is true for you. One embraces one's beloved wife with more devotion and one embraces one's daughter with more devotion; i.e., one embraces her with maternal affection.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)