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mahabharat 13.45.7: ऋतुएँ, दिन और रात, एकान्त में पाप करते हुए मनुष्य को सदैव देखते रहते हैं ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 13.45: देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 45: देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.45.7 
कुर्वाणं हि नरं कर्म पापं रहसि सर्वदा।
पश्यन्ति ऋतवश्चापि तथा दिननिशेऽप्युत॥ ७॥
 
 
अनुवाद
ऋतुएँ, दिन और रात, एकान्त में पाप करते हुए मनुष्य को सदैव देखते रहते हैं ॥7॥
 
The seasons, day and night always watch a man committing sins in solitude. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)