श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 45: देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  13.45.4-5 
देवशर्मोवाच
यद् वै तन्मिथुनं ब्रह्मन्नहोरात्रं हि विद्धि तत्।
चक्रवत् परिवर्तेत तत् ते जानाति दुष्कृतम्॥ ४॥
ये च ते पुरुषा विप्र अक्षैर्दीव्यन्ति हृष्टवत्।
ऋतूंस्तानभिजानीहि ते ते जानन्ति दुष्कृतम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
देवशर्मा बोले - ब्रह्मन्! तुमने जो स्त्री-पुरुष का जोड़ा देखा, उसे दिन और रात के समान समझो। वे दोनों चक्र के समान घूमते रहते हैं, इसलिए वे तुम्हारे पाप को जानते हैं। ब्रह्मन्! और जो छह पुरुष बड़े आनन्द से जुआ खेलते देखे गए थे, उन्हें भी छह ऋतुएँ समझो; वे भी तुम्हारे पाप को जानते हैं।
 
Dev Sharma said - Brahman! Consider the couple of man and woman you saw as day and night. Both of them keep rotating like a wheel, hence they know about your sin. Brahmin! And the six men who were seen gambling in great joy, consider them as six seasons; they too know about your sin. 4-5.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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