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श्लोक 13.45.2  |
देवशर्मोवाच
किं ते विपुल दृष्टं वै तस्मिन् शिष्य महावने।
ते त्वां जानन्ति विपुल आत्मा च रुचिरेव च॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| देवशर्मा ने पूछा- हे प्रिय शिष्य विपुल! उस महान वन में तुमने क्या देखा? वे लोग तुम्हें जानते हैं। उन्हें तुम्हारी आत्मा का तथा मेरी पत्नी रुचि का भी पूर्ण ज्ञान है॥ 2॥ |
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| Dev Sharma asked- My dear disciple Vipul! What did you see in that great forest? Those people know you. They have complete knowledge of your soul and also of my wife Ruchi.॥ 2॥ |
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