श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  13.44.5 
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्या काचिद् वराङ्गना।
बिभ्रती परमं रूपं जगामाथ विहायसा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उन्हीं दिनों देवलोक से एक सुन्दर दिव्य स्त्री अत्यन्त मनोहर रूप धारण करके आकाशमार्ग से कहीं जा रही थी ॥5॥
 
During those days, a beautiful divine lady from the celestial world was going somewhere through the sky, assuming a very charming form. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)