श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.44.33 
स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ।
पूजयामास च गुरुं विधिवत् स गुरुप्रिय:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
चंपानगर जाकर गुरु-प्रेमी विपुल ने वे पुष्प गुरुजी को अर्पित किए तथा विधि-विधान से उनकी पूजा की।
 
Going to Champanagar, Guru-lover Vipul offered those flowers to Guruji and worshipped him as per the rituals.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने द्विचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)