स चम्पां नगरीमेत्य पुष्पाणि गुरवे ददौ।
पूजयामास च गुरुं विधिवत् स गुरुप्रिय:॥ ३३॥
अनुवाद
चंपानगर जाकर गुरु-प्रेमी विपुल ने वे पुष्प गुरुजी को अर्पित किए तथा विधि-विधान से उनकी पूजा की।
Going to Champanagar, Guru-lover Vipul offered those flowers to Guruji and worshipped him as per the rituals.
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विपुलोपाख्याने द्विचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विपुलका उपाख्यानविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४२॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)