श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  13.44.32 
एतदात्मनि कौरव्य दुष्कृतं विपुलस्तदा।
अमन्यत महाभाग तथा तच्च न संशय:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! उस समय विपुल ने मन ही मन इसे पाप समझा और निस्संदेह बात ऐसी ही थी।
 
O great son of Kuru! At that time Vipula considered this to be a sin in his mind and undoubtedly the matter was like this. 32.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)