श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  13.44.29 
सम्प्रदध्यौ तथा राजन्नग्नावग्निरिवाहित:।
दह्यमानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
राजन! किन्तु अपने प्रति ऐसा शाप सुनकर मानो एक अग्नि पर दूसरी अग्नि रख दी गई हो और उसकी लपटें और भी बढ़ गई हों, उसी प्रकार विपुल का हृदय शोक की अग्नि में जलने लगा और उस अवस्था में वह पुनः अपने किये पर विचार करने लगा।
 
King! But on hearing such a curse against himself, as if one fire was placed on another fire and its flames increased even more, in the same way Vipul's heart started burning in the fire of grief and in that state he again started thinking about his actions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)