श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  13.44.28 
एतत् श्रुत्वा तु विपुलो नापश्यद् धर्मसंकरम्।
जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मन:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर विपुल को अपने जन्म से लेकर वर्तमान समय तक के सब कर्म स्मरण हो आए; परंतु उन्होंने कभी भी पाप के साथ पुण्य का मिश्रण नहीं देखा॥ 28॥
 
On hearing this, Vipula recalled all his deeds from his birth till the present time; but he never saw any mixture of virtue with sin.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)