vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना
»
श्लोक 28
श्लोक
13.44.28
एतत् श्रुत्वा तु विपुलो नापश्यद् धर्मसंकरम्।
जन्मप्रभृति कौरव्य कृतपूर्वमथात्मन:॥ २८॥
अनुवाद
यह सुनकर विपुल को अपने जन्म से लेकर वर्तमान समय तक के सब कर्म स्मरण हो आए; परंतु उन्होंने कभी भी पाप के साथ पुण्य का मिश्रण नहीं देखा॥ 28॥
On hearing this, Vipula recalled all his deeds from his birth till the present time; but he never saw any mixture of virtue with sin.॥ 28॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×