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mahabharat 13.44.25-26: तत्पश्चात् विपुल ने अन्य छह पुरुषों को देखा जो लोभ और हर्ष से भरे हुए सोने-चाँदी के पासों से जुआ खेल रहे थे। वे भी वही शपथ ले रहे थे जो पहले पुरुष और स्त्री ने ली थी। वे विपुल की ओर संकेत करके बोले-॥25-26॥   |   mahabharat अध्याय 13.44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  13.44.25-26 
तत: षडन्यान् पुरुषानक्षै: काञ्चनराजतै:।
अपश्यद् दीव्यमानान् वै लोभहर्षान्वितांस्तथा॥ २५॥
कुर्वत: शपथं तेन य: कृतो मिथुनेन तु।
विपुलं वै समुद्दिश्य तेऽपि वाक्यमथाब्रुवन्॥ २६॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् विपुल ने अन्य छह पुरुषों को देखा जो लोभ और हर्ष से भरे हुए सोने-चाँदी के पासों से जुआ खेल रहे थे। वे भी वही शपथ ले रहे थे जो पहले पुरुष और स्त्री ने ली थी। वे विपुल की ओर संकेत करके बोले-॥25-26॥
 
Thereafter Vipul saw six other men who were gambling with gold and silver dice and were full of greed and joy. They too were taking the same oath as the first man and woman had taken. Pointing at Vipul they said-॥25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)