vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना
»
श्लोक 24
श्लोक
13.44.24
एवं संचिन्तयन्नेव विपुलो राजसत्तम।
अवाङ्मुखो दीनमना दध्यौ दुष्कृतमात्मन:॥ २४॥
अनुवाद
हे श्रेष्ठ! ऐसा विचारकर विपुल विनम्र हो गया और अपने दुष्कर्मों को स्मरण करने लगा॥24॥
The best! Thinking like this, Vipul became humble and started remembering his misdeeds. 24॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×